अगली सुबह मुझे सपने याद नहीं थे।बस एक अजीब-सा बोझ था, जैसे रात में कुछ अधूरा रह गया हो।डायरी मैंने नहीं खोली।कम से कम, मुझे ऐसा ही लगा।मैंने खुद से तय किया था कि आज उसे हाथ नहीं लगाऊँगी। कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनसे दूरी ही बेहतर लगती है, भले ही वो जवाब माँगते रहें।ऑफिस का दिन सामान्य था। मीटिंग्स, ई-मेल, वही रोज़ का शोर। मैं सब कर रही थी, लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे दिमाग़ का एक हिस्सा कहीं और अटका हुआ है।दोपहर में कॉफी लेने गई तो रिसेप्शन पर एक पुरानी फाइल रखी दिखी। शायद किसी