वाशिकारिणी - 5

आईना जो सच नहीं दिखाताशक्ति की चीख किले की दीवारों से टकराकर लौट आई…लेकिन उसकी आवाज़ उसे खुद सुनाई नहीं दी।सब कुछ अचानक शांत हो गया।कोई लाश नहीं।कोई चीख नहीं।कोई खून नहीं।वो ज़मीन पर पड़ा हाँफ रहा था।“मैं… ज़िंदा हूँ…?”उसने खुद से फुसफुसाकर पूछा।धीरे-धीरे उसने आँखें खोलीं।वो किले में नहीं था।बल्कि…अपने ही कमरे में।वही पुराना पलंग।वही अलमारी।वही टूटी घड़ी— जो पाँच साल से बंद थी।घड़ी की सुइयाँ अचानक चलने लगीं।टिक… टिक… टिक…शक्ति घबरा गया।“ये सपना था… हाँ… सब सपना था…”तभी आईने में उसकी नज़र पड़ी।वो जड़ हो गया।आईने में उसका प्रतिबिंब मुस्कुरा रहा था।जबकि उसके चेहरे पर डर था।आईने वाला