वाशिकारिणी - 4

सच का पहला दरवाज़ाउस आदमी की आवाज़ में अजीब सी ठंडक थी।शक्ति उसकी तरफ देखता रहा, जैसे शब्द उसके कानों तक पहुँच ही नहीं रहे हों।“सच…?”शक्ति की आवाज़ काँप गई।“तुम कौन हो? और तुम्हें ये सब कैसे पता?”आदमी हल्की मुस्कान के साथ बोला—“मेरा नाम जानना अभी ज़रूरी नहीं है। ज़रूरी ये है कि जो तुमने अभी देखा… वो सिर्फ़ शुरुआत थी।”शक्ति के दिमाग़ में रति का चेहरा घूम गया—उसकी आँखें, आँसू, और अचानक गायब हो जाना।“वो सच में थी या… कोई परछाईं?”आदमी ने धीमे स्वर में कहा—“वो ज़िंदा है… और नहीं भी।”“ये कैसी बकवास है?”शक्ति गुस्से में चिल्लाया।आदमी ने ज़मीन