नक्षत्र यात्री - अध्याय 4: थकान और संकल्पपोर्टल के भीतर का दृश्य वैसा नहीं था जैसा माया ने कल्पना की थी। यहाँ न तो ज़मीन थी और न ही आसमान, बस चारों ओर नीली और बैंगनी रोशनी की लहरें तैर रही थीं। हवा में एक अजीब सा भारीपन था, जो माया के फेफड़ों पर दबाव डाल रहा था।माया के पैर अब पत्थर के हो चुके थे। हर कदम ऐसा लग रहा था जैसे वह मीलों का बोझ उठाकर चल रही हो। उसकी आँखों के सामने धुंधलापन छाने लगा था।"मैं... मैं और नहीं चल सकती," वह बुदबुदाई और एक ठंडी, चमकती