(रात के 2:34 बजे। कमरे में हल्की पीली रोशनी।(सुनीति चश्मा लगाए खड़ी है। कौशिक उसके सामने बैठा है — पहली बार पूरी तरह साफ़ दिखाई देता हुआ।)(दोनों चुप हैं।)कभी-कभी जब कोई सपना सच होता है…तो इंसान डरता है कि कहीं आँख झपकते ही टूट न जाए।सुनीति (धीरे से) बोली - “तुम… ऐसे सामने बैठकरमुझसे बात करोगे…मैंने कभी सोचा भी नहीं था।”कौशिक (मुस्कुराकर)। बोला - “मैं भी नहीं।मैं तो भूल ही चुका था किकोई मुझे इस तरह देख पाएगा।”(सुनीति उसे ध्यान से देखती है।)सुनीति बोली - “तुम थके हुए लगते हो।”कौशिक (सच्चाई से) बोला - “क्योंकि दो साल से…मैं बस मौजूद था,पर ज़िंदा नहीं।”(सुनीति पानी