शहर को अक्सर लोग भीड़ से पहचानते हैं,लेकिन कुछ लोग शहर को उसकी तन्हाइयों से पहचानते हैं।वह भी उन्हीं लोगों में से थी।उस सुबह बारिश नहीं हो रही थी,लेकिन हवा में वह नमी थीजो बिना बोले बता देती हैकि आज कुछ बदलने वाला है।खिड़की के शीशे पर हल्की धुंध जम रही थी,और सामने वाली सड़क पर लोग अपनी-अपनी ज़िंदगी उठाएतेज़ क़दमों से चल रहे थे।वह कैफ़े के अंदर बैठी थी,हमेशा की तरह खिड़की के पास।यह उसकी आदत नहीं,ज़रूरत थी।यहाँ बैठ कर उसे लगता थाकि दुनिया को देखा जा सकता हैबिना उसका हिस्सा बने।उसके सामने डायरी खुली हुई थी।कुछ पन्ने भरे