अदृश्य पीया - 5

सुनीति अपने घर में टहल रही है। बेचैन नज़रें, कांपते हाथ। अचानक दरवाज़े पर घंटी बजती है।सुनीति (दरवाज़ा खोलते हुए) बोली - तरुण… अंदर आओ।तरुण अंदर आता है। सुनीति उसे बैठने का इशारा करती है।सुनीति (गंभीर आवाज़ में) बोली - तरुण… अब मैं तुमसे वो बात कहने जा रही हूँ, जो शायद कोई विश्वास नहीं करेगा।ये कमरा… ये जगह… ये सिर्फ़ मेरी नहीं है। यहाँ कोई और भी है… कौशिक ठाकुर।तरुण थोड़ी देर चुप रहता है, फिर हंसकर कहता है।तरुण बोला - मतलब वही लड़का जो गायब हो गया था?सुनीति (तेज़ी से सिर हिलाकर) बोली - हाँ… वो यहीं है। अदृश्य। मैंने उसे महसूस