सर्दियों की धूप और तुम्हारी यादें

दिसंबर की वह सुबह कड़ाके की ठंड लेकर आई थी। शिमला की पहाड़ियों पर बर्फ की सफेद चादर बिछी हुई थी और पेड़ों की टहनियों से ओस की बूंदें मोती की तरह टपक रही थीं। विक्रम अपने पुराने लकड़ी के कॉटेज के बरामदे में बैठा था। उसने एक मोटा ऊनी स्वेटर और मफलर लपेट रखा था। उसके सामने मेज पर रखी चाय से भाप निकल रही थी, जो ठंडी हवा में विलीन हो रही थी।विक्रम की नजरें सामने की पहाड़ी पर टिकी थीं, लेकिन उसका मन अतीत की गलियों में भटक रहा था। तभी अंदर से अंजलि की आवाज आई,