वक़्त का सफ़र कितना अजीब होता है ना —कभी किसी को रोज़ देखना भी कम लगता है,और फिर एक दिनवही इंसानज़िंदगी से ऐसे दूर चला जाता हैजैसे कभी पास था ही नहीं।ना कोई लड़ाई,ना कोई शिकायत,ना कोई आख़िरी बात —बस एक अधूरी-सी ख़ामोशीजो धीरे-धीरेपूरी ज़िंदगी में फैल जाती है।कुछ रिश्तेधीरे-धीरे नहीं टूटते।वो बस एक दिनबोलना छोड़ देते हैं।और वही चुप्पीउम्र भर साथ चलती है। Prakhra आजउसी मोड़ पर खड़ी थीजहाँ हर रास्ताकभी आरव तक पहुँचता था।कॉफ़ी कैफ़े का वही पुराना कोना —जहाँ कभी उसकी हँसीदीवारों से टकराकरबार-बार लौट आती थी।जहाँ पहली बारनज़रें मिली थीं,और बातों से पहलेख़ामोशी ने जगह बनाई