असुरविद्या - 3

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अध्याय - 3 पारस पत्थरविहान के चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान उभरी जिसने यक्षिणी को भी पल भर के लिए खामोश कर दिया. वह मुस्कान किसी मासूम इंसान की नहीं थी, बल्कि उस' विलेन' की थी जो अब अपनी नियति को खुद लिखने के लिए तैयार था.विहान धीरे- धीरे हँसने लगा—एक कडवी, खतरनाक और रहस्यमयी हंसी.खून? विहान ने अपनी खोखली आँखों से यक्षिणी को देखा. तुमने अभी मेरा शरीर देखा है? दो महीने अस्पताल में सडकर लौटा हूँ. मेरी रगों में तो इतना खून भी नहीं बचा कि यह पत्थर अपनी प्यास बुझा सके. अगर मैंने अपना खून दिया, तो