समर्पण से आंगे - 12

‎भाग – 12‎‎‎गाँव की मिट्टी‎आज सृष्टि के पैरों को‎पहले जैसी नहीं लगी।‎‎न डर था,‎न अपनापन—‎बस एक ठोस सच्चाई।‎‎अंकित उसके साथ था,‎लेकिन यह लड़ाई‎उसे खुद लड़नी थी।‎‎गाँव में उनके आने की खबर‎आग की तरह फैल गई।‎‎“विधवा लौट आई है…”‎“साथ में वही लड़का है…”‎“अब क्या नया तमाशा होगा?”‎‎ये फुसफुसाहटें‎सृष्टि ने सुनीं,‎लेकिन इस बार‎उसने सिर नहीं झुकाया।‎‎वह सीधे‎अपने पुराने घर के सामने खड़ी हुई।‎‎दरवाज़ा वही था,‎लेकिन उसके अंदर जाने की हिम्मत‎अब उसके भीतर थी।‎‎सास ने दरवाज़ा खोला।‎‎एक पल के लिए‎उनकी आँखों में‎अपराध चमका।‎‎‎उनकी आवाज़ लड़खड़ाई।‎तुम‎‎‎सृष्टि ने साफ़ कहा,‎ मैं, ‎“सच लेकर आई हूँ।”‎‎घर के आँगन में‎लोग इकट्ठा होने लगे।‎‎पंचायत अपने-आप‎बैठ गई।‎‎देवर भी आ गया।‎‎उसकी