भाग – 11रात बहुत भारी थी।ऐसी रात, जिसमें नींद आँखों से नहींसोचों से भाग जाती है।सृष्टि खिड़की के पास बैठी थी।बाहर अँधेरा था,और भीतर सवाल।बहिष्कार का संदेशअब भी उसके फ़ोन पर चमक रहा था—जैसे कोई चेतावनी नहीं,फ़ैसला हो।“अगर शादी नहीं,तो समाज नहीं।”यह वही भाषा थीजिसने उसे पहले भीखामोश किया था।लेकिन इस बारवह खामोश नहीं थी—बस उलझी हुई थी।उसे अपना पहला पति याद आया।वह शादी,जो उसने अपनी मर्ज़ी से नहीं,परिवार की इज़्ज़त के नाम पर की थी।“समझौता कर लो,”सबने कहा था।और उसने कर लिया।उस दिनउसने अपनी इच्छाएँअलमारी में बंद कर दी थीं।और जब वह पति चला गया,तो वही लोग बोले—“किस्मत।”सृष्टि ने