पिता का सुनापन

पिता का सुनापनपिता… जो घर में होते हुए भी अकेले रह जाते हैं, घर में सब कुछ था, छत थी, दीवारें थीं, रसोई की खुशबू थी, हँसी-मज़ाक की आवाज़ें थीं, टीवी चलता था, मोबाइल बजते थे। बस एक चीज़ नहीं थी— पिता की अहमियत।शिवनारायण जी रोज़ की तरह सुबह सबसे पहले उठे थे सूरज अभी ठीक से निकला भी नहीं था उन्होंने चुपचाप दरवाज़ा खोला बाहर झाड़ू लगाई, आँगन में तुलसी को पानी दिया, घर सो रहा था, और पिता… हमेशा की तरह जागते हुए भी अकेले थे।कभी-कभी कोई चीज़ इतनी हमेशा साथ रहती हैं कि उसका होना हमें दिखना