समर्पण से आंगे - 10

‎भाग – 10‎‎‎शाम का समय था।‎सृष्टि की सिलाई मशीन आज कुछ ज़्यादा देर तक चलती रही।‎‎काम अब बढ़ने लगा था,‎लोग भरोसा करने लगे थे—‎लेकिन भरोसे के साथ‎सवाल भी लौट आए थे।‎‎“अब आगे क्या?”‎यह सवाल‎हर दूसरे दिन‎किसी न किसी रूप में‎उसके सामने आ जाता।‎‎आज यह सवाल‎अंकित की आँखों में था।‎सृष्टिऔर अंकित ‎वे दोनों छत पर बैठे थे।‎आसमान में हल्की-हल्की लालिमा थी,‎जैसे दिन और रात‎एक-दूसरे से समझौता कर रहे हों।‎‎‎अंकित ने धीरे से कहा, सृष्टि‎“क्या तुम्हें लगता है‎हम हमेशा ऐसे ही रह सकते हैं?”‎‎सृष्टि समझ गई—की अंकित क्या कहना चाहता है ‎यह सवाल सिर्फ़ साथ रहने का नहीं,‎नाम का है।‎‎वह कुछ पल