उस शाम की चाय (जो मैं खुद से कह नहीं पाई)वाराणसी की शामें कभी पूरी तरह शाम नहीं होतीं।सूरज ढलते ही गंगा पर एक सुनहरा-सा पर्दा पड़ जाता है, लेकिन दिल की थकान उससे पहले ही शुरू हो जाती है।मैं उस दिन घाट से थोड़ी दूर, एक पुरानी चाय की दुकान पर बैठी थी।दुकान छोटी-सी थी – लकड़ी की टूटी-फूटी टेबल, चार-पांच कुल्हड़ रखने वाली ट्रे, और पीछे एक बूढ़ा चाय वाला जो बिना मुस्कुराए चाय बनाता था।आसपास लोग थे – कोई जोड़े में हाथ पकड़े घूम रहा था, कोई बच्चे कंधे पर उठाए हंस रहे थे, कोई अकेला साधु