असुरविद्या - 2

(249)
  • 3.2k
  • 1.2k

अध्याय 2 - यक्षिणी चित्रा क्षण भर के लिए सब कुछ ठहर गया. जैसे ही खून कागज के रेशों में समाया, कमरे की हवा ठंडी होकर जमने लगी. किताब के भीतर से एक ऐसी फुसफुसाहट उभरी, मानो हजारों आत्माएं पाताल की गहराइयों से एक साथ विलाप कर रही हों. विहान झटके से पीछे हटा, किताब फर्श पर गिरी, पर बंद नहीं हुई. वह धडकने लगी— धक. धक. धक. जैसे उसके भीतर कोई प्राचीन हृदय फिर से धडक उठा हो.पन्नों से एक अलौकिक नीली रोशनी फूटी, जो धीरे- धीरे धुएँ की तरह काली पडने लगी. कमरे का इकलौता बल्ब एक तीखी आवाज