अध्याय 9 आखरी आदेश हवेली का वह भव्य दरबार अब किसी श्मशान की शांति ओढ़े हुए था। सन्नाटा इतना गहरा था कि अविन को अपनी ही धड़कनें किसी नगाड़े की तरह सुनाई दे रही थीं। उसकी उंगलियाँ उस जादुई पेंटिंग पर थमी हुई थीं, जिसे चित्रसेन ने अपनी यादों की राख से बनाया था।अविन के सामने उसके पिता, प्रताप सिंह चौहान खड़े थे।बचपन के उस एक्सीडेंट ने अविन से न केवल उसके माता-पिता छीने थे, बल्कि उसकी यादों का एक बड़ा हिस्सा भी मिटा दिया था। उसे बस इतना याद था कि वह उस रात कार में था, चीखें थीं, कांच