समर्पण से आंगे - 9

‎‎भाग – 9‎‎‎स्टेशन पर उतरते ही सृष्टि ने गहरी साँस ली।‎‎वही शहर,‎वही सड़कें,‎लेकिन अब उसकी चाल में झिझक नहीं थी।‎‎यह वही जगह थी‎जहाँ से वह टूटकर गई थी,‎और अब खुद को जोड़कर लौट रही थी।‎‎मौसी ने जाते वक्त सिर्फ़ इतना कहा था—‎“अब तू झुकी हुई नहीं लगती।”‎‎सृष्टि जानती थी—‎यह सफ़र वापस आने का नहीं,‎खुद को सामने रखने का है।‎‎उधर अंकित स्टेशन के बाहर खड़ा था।‎उसे देखते ही सृष्टि रुक गई।‎‎कुछ पल दोनों बस एक-दूसरे को देखते रहे।‎‎न आँसू,‎न मुस्कान—‎बस एक गहरा भरोसा।‎‎अंकित ने पूछा।‎“कैसी हो?”‎‎‎सृष्टि ने जवाब दिया।‎“पहले से ज़्यादा ज़िंदा,”‎‎‎यह सुनकर अंकित की आँखें भर आईं।‎‎रास्ते भर वे कम