समर्पण से आंगे - 8

‎‎‎भाग – 8‎‎बस की खिड़की से बाहर भागती सड़क‎सृष्टि की आँखों के अंदर भी भाग रही थी।‎‎नया शहर।‎नई जगह।‎और एक ऐसा खालीपन‎जो हर मोड़ पर‎उसे अंकित की याद दिला रहा था।‎‎मौसी का घर छोटा था,‎लेकिन अपनापन था।‎मौसी ने बिना सवाल किए‎उसे अपने पास रख लिया।‎‎मौसी ने सृष्टि से कहा,‎“कुछ दिन रुक जा,”‎“फिर आगे देखा जाएगा।”‎‎लेकिन सृष्टि जानती थी—‎ उसके दिल में हमेशा एक डर बना रहता था ।‎ उसे पता था।‎ज़िंदगी कभी “कुछ दिन” में नहीं चलती।‎‎ सृष्टि को मौसी के यहां ‎ खाली बैठना पसंद नहीं था‎यहाँ उसे काम ढूँढना पड़ा।‎ उसने पहले घरों में बर्तन धोए ,‎फिर सिलाई सीखने