मासूम चेहरा - गीता - 5

सभी रस्म बारी बारी से पुरी की जा रहीं थीं। आस पड़ोस की औरतों का गाना बजाना। ओर गीता का हस खेल कर बाते करना। लग रा था गीता मन ही मन बहुत ज्यादा खुश है। वक्त का पता भी नहीं लग रहा था कहा भागे जा रहा था। मगर गीता अब भी अचरज में थी। की शादी का माहोल है मगर यह बस घर ही घर में है। आस पड़ोस की इन चार औरतों के अलावा किसी को कानों कान खबर क्यू नहीं हैं। मगर जो भी हो गीता अब खुश थी। कम से कम उसकी शादी अब थोड़ी शादी सी