आरव भागता हुआ अपने कमरे तक पहुँचा। उसकी रूह में एक अजीब-सी ठंडक उतर गई थी। कुछ देर तक वह अपने कमरे में यूँ ही चुपचाप बैठा रहा और बीती हुई सारी घटनाओं को याद कर सोचता रहा— “आख़िर वह सब क्या था? ऐसा क्यों हो रहा था?” तभी उसे उस डायरी की याद आई। उसने मन ही मन सोचा, “शायद मेरे सभी सवालों के जवाब उसी डायरी के भीतर हों।” यह सोचते ही जैसे ही आरव ने डायरी खोली, उसके पन्ने अपने-आप लिखने लगे— “तुम अब हमारे साथ हो...” पहले तो आरव को लगा कि यह सब उसका वहम है। उसने अपनी आँखें मलीं और