खिड़की का सायास्मृतियों का कोहराअगली सुबह जब माया की आँख खुली, तो उसके कमरे में मोगरे की एक भीनी-भीनी खुशबू फैली हुई थी। ताज्जुब की बात यह थी कि उसके कमरे में कोई फूल नहीं था। खिड़की खुली थी और रात की बारिश की कुछ बूंदें अभी भी कांच पर मोती की तरह चमक रही थीं। माया ने अपने सिरहाने रखी उस फटी हुई फोटो को दोबारा गौर से देखा। जैसे-जैसे वह फोटो को देखती, उसके सिर में एक मीठा सा दर्द उठता और धुंधली तस्वीरें उसकी आँखों के सामने नाचने लगतीं।उसने ऑफिस से इस्तीफा तो दे दिया था, लेकिन