सन्नाटे की गूँजमाया की ज़िंदगी एक खाली कमरे की तरह थी—चुपचाप, उदास और अकेली। तीस साल की हो चुकी थी वह, लेकिन शादी का ख्याल उसके मन के किसी कोने में दफन हो चुका था। वह एक छोटे से सरकारी दफ्तर में क्लर्क थी, जहाँ उसका पूरा दिन पीली पड़ चुकी फाइलों को उलटने-पलटने और धूल झाड़ने में बीत जाता। ऑफिस के लोग उसे 'मशीन' कहते थे क्योंकि वह न किसी से हँसती थी, न कोई सहेली थी।शाम ढलते ही वह अपने उस पुराने फ्लैट की ओर चल देती, जो शहर के एक ऐसे कोने में था जहाँ वक्त जैसे