चार हाथ, दो आँखेंलेखक राज फुलवरे (एक आत्मा, एक शहर और एक छिपा हुआ अपराध)अध्याय 1 : वह जगह जहाँ शहर साँस लेना भूल जाता हैहर शहर में एक जगह होती हैजिसे लोग नक्शे में नहीं ढूँढतेलेकिन डर में ज़रूर याद रखते हैं।यह जगह शहर के आख़िरी छोर पर थी।जहाँ सड़क अचानक खत्म हो जाती थीऔर आगे सिर्फ़ वीरान ज़मीन, झाड़ियाँ और सन्नाटा था।उसी सन्नाटे के बीचखड़ा था एक पुराना सुलभ शौचालय।उसकी दीवारें इतनी सीली थींकि हाथ लगाने पर उँगलियाँ भीग जातीं।छत से लगातार पानी टपकता रहता,जैसे कोई अदृश्य घड़ीसमय नहीं,गिनती कर रही हो।रात होते हीहवा वहाँ रुक जाती।कुत्ते उस तरफ़