बचपन के निराले दिन, कब लौट के आने वाले दिन। घुमना-फिरना, मिलना-मिलाना, हंसी-ठहाके, सब यादों में बसे हैं। मेरे बचपन के तरह ही गुजरा, छाया और रोहना का बचपन। रमणीक अपार्टमेंन्ट के प्रथम तल पर छाया और दुसरे तल पर रोहन का घर। सभी बच्चों में ही लगाव था, लेकिन एक ही अपाटमेन्ट में होने के कारण छाया और रोहन का आपसी लगाव अधीक था।छाया ने तुतलाते हुए कहा ’’ मैं जहाँ चुपती हुं, तुम ढुंढ लेते हो। जलूल अमर ही होगा जो तुमको मेरे बारे में आज भी बता दिया। ’’रोहन ने भी थोड़ा मुस्करा कर कहा ’’