वह शाम जो कभी ढलि नहीं

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खामोश स्टेशन की वो आखिरी शामभाग 1: पुरानी यादेंशहर की चकाचौंध वाली जिंदगी से दूर, नर्णौल के किनारे बसा वो पुराना रेलवे स्टेशन आज भी वैसा ही था—जंग लगे प्लेटफॉर्म, टूटे-फूटे बेंच और हवा में घुली हुई पुरानी ट्रेनों की खुशबू। बेंच नंबर 4 पर नील बैठा था, जैसे हर शाम बैठता था। उसके हाथ में एक फटी हुई डायरी थी, जिसके पन्ने पीले पड़ चुके थे, और आँखें स्टेशन के उस छोर पर टिकी हुईं, जहाँ से ट्रेनें आती थीं। लोग उसे देखते, कुछ मुस्कुराते, कुछ सहानुभूति से सिर हिलाते, लेकिन कोई नहीं रुकता। कौन जानता था कि नील