तेरे बिना अधूरा मैंलेखक: कौशिक दवेशाम ढल रही थी। आसमान में नारंगी और भूरे रंग घुल चुके थे, जैसे किसी ने दर्द को रंगों में उकेर दिया हो। प्लेटफॉर्म नंबर तीन पर खड़ी वह लड़की, भीड़ में होते हुए भी अकेली थी। उसके हाथ में छोटा-सा बैग था और आंखों में ठहरा हुआ सैलाब। ट्रेन आने की आवाज़ दूर से ही दिल के तार हिला देती थी, क्योंकि हर ट्रेन उसे उसी मोड़ पर ले जाती थी—जहां से लौटना मना होता है।आरव उसी प्लेटफॉर्म के दूसरे सिरे पर खड़ा था। पीठ झुकाए, नजरें ज़मीन पर गड़ी हुईं। वह जानता था