वो आख़िरी चिट्ठी

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सुबह की हल्की ठंड थी। खिड़की से आती धूप कमरे की दीवारों पर बिखर रही थी। बाहर गली में लोगों की आवाज़ें थीं, बच्चे स्कूल जाने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन रिया के कमरे में अजीब-सी ख़ामोशी पसरी हुई थी। वह बिस्तर पर बैठी छत को देख रही थी, जैसे वहाँ कोई जवाब लिखा हो, जो वह पढ़ नहीं पा रही थी।रिया धीरे-धीरे उठी। रोज़ की तरह आज भी उसका मन भारी था। इस घर में रहते हुए उसे कभी यह एहसास नहीं हुआ कि कोई उसे सच में समझता है। माँ हर समय काम में व्यस्त रहती थीं,