भाग चारचिट्ठी का इंतजारउस दिन डाकिया चाचा की साइकिल गली में बहुत देर तक खड़ी रही, घंटी नहीं बजी, यह छोटी-सी बात थी, पर रामदीन के घर के लिए यह अशुभ संकेत बन गई।अम्मा दरवाज़े पर ही खड़ी थीं, उनकी आँखें साइकिल पर टिकी थीं पर दिल किसी और ही दिशा में भाग रहा था।डाकिया चाचा ने धीरे-धीरे थैला उतारा।आज उनके कंधे और झुके हुए थे, जैसे बोझ चिट्ठियों का नहीं, किसी अनहोनी की खबर का हो।थैले से उन्होंने एक लिफ़ाफ़ा निकाला जो अब सफेद नहीं था वह हल्का भूरा था जिसके ऊपर लाल सरकारी मुहर लगी थी।अम्मा का हाथ