चिट्ठी का इंतजार - भाग 3

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भाग तीन"चिट्ठी का इंतजार"जहाँ आशा और भय बराबर खड़े होते हैंजहाँ शब्द टूटने लगते हैं, और मौन बोलने लगता है।अब चिट्ठियाँ सिर्फ ख़बर नहीं लाती थीं, वे मौन संकेत लाने लगी थीं, रामदीन के घर में सब कुछ पहले जैसा ही था, वही आँगन, वही चौकी, वही पीपल की छाया, पर उस स्थिरता के भीतर कुछ टूट रहा था, धीरे-धीरे, बिना आवाज किए।मोहन की चिट्ठियाँ अब छोटी हो गई थीं,पहले जहाँ पूरा पन्ना भर जाता था,अब आधा भी नहीं भरता।“मैं ठीक हूँ” अब “ठीक हूँ” बन गया था।बाबूजी इस बदलाव को समझ रहे थे, वे चिट्ठी पढ़ते समय हर विराम