चिट्ठी का इंतजार - भाग 2

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भाग दो"चिठ्ठी का इन्तजार"मोहन को गए हुए तीन बरस हो चुके थे।तीन बरस — कहने को तो बस तीन शब्द,पर अम्मा के लिए हर बरस एक पूरी उम्र था।शहर जाने के दिन मोहन ने जाते-जाते कहा था, “अम्मा, बस काम लग जाए, फिर आपको भी बुला लूँगा।” अम्मा मुस्कुरा दी थीं। माँ जानती है, बेटे झूठ नहीं बोलते,बस समय सच नहीं बोलने देता।उस दिन के बाद से अम्मा की सुबहें बदल गई थीं। अब वह सूरज से पहले उठ जातीं।चूल्हे पर चढ़ती पहली रोटी भगवान को नहीं,मोहन को अर्पित होती। “जहाँ भी हो, पेट भर के खाना…” वे बुदबुदातीं।मोहन शहर