गाड़ी के अंदर सन्नाटा ऐसा था जैसे किसी ने सारी आवाजें निगल ली हों। बिंदु की नजरें पीछे की सीट पर जमी थीं। जहां सुधीर होना चाहिए था वहां अब वह आकृति बैठी थी। उसका चेहरा आधा अंधेरे में छुपा था और आधा बिजली की चमक में दिख रहा था। वह चेहरा सुधीर जैसा ही था लेकिन आंखों में कोई भाव नहीं था। सिर्फ खालीपन और ठंडक।वैशाली ने डरते डरते पीछे मुड़कर देखा और उसका गला सूख गया। वह चीखना चाहती थी लेकिन आवाज बाहर ही नहीं आ रही थी। अजय ने कांपते हाथों से गाड़ी की चाबी घुमाई। इंजन