"चिठ्ठी का इंतजार"एक ज़माना था…जब समय घड़ी की सुइयों से नहीं, इंतज़ार की धड़कनों से मापा जाता था।उस छोटे से कस्बे की सुबह बड़ी सादी होती थी। सूरज निकलता, चूल्हों में आग जलती, और गलियों में झाड़ू की आवाज़ गूंजती।पर जिस आवाज़ का सबको बेसब्री से इंतज़ार रहता, वह होती थी — डाकिया की साइकिल की घंटी।रामदीन के घर में यह इंतज़ार जैसे रोज़ की पूजा थी। आँगन में पीपल के पत्तों की छाया पड़ती थी। बीच में एक पुरानी चौकी रखी रहती, जिसके चारों पाये ज़मीन में धँस चुके थे। उसी पर बैठी रहती थीं अम्मा — आँचल सिर