समर्पण से आंगे - 5

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‎भाग – 5‎‎‎माँ के फैसले के बाद सब कुछ बाहर से सामान्य दिख रहा था,‎लेकिन अंदर ही अंदर हर रिश्ता किसी कच्ची दीवार की तरह दरकने लगा था।‎‎मंदिर के बाहर सृष्टि फिर से फूल बेचने लगी थी,‎लेकिन अब उसकी हर हरकत पर नज़र थी।‎वह जानती थी—अब वह सिर्फ़ “सृष्टि” नहीं रही,‎अब वह “वही विधवा” बन चुकी थी,‎जिसका नाम फुसफुसाहटों में लिया जाता है।‎‎ लोग तरह तरह की बातें करने लगे ‎“आजकल बहुत हँसने लगी है…”‎“किसके भरोसे?”‎“शहर वाले लड़के का असर है…”‎‎ये बातें सीधे कानों तक नहीं आती थीं,‎लेकिन हवा में तैरती हुई दिल तक पहुँच जाती थीं।‎‎अंकित ने दूरी बना ली