तख्ती, टाट-पट्टटी और वो बचपन

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सर्दियों की हल्की धूप खिली थी। 75 वर्षीय रामदीन बाबू अपनी छड़ी टेकते हुए पार्क के किनारे धीरे-धीरे चल रहे थे। तभी पास की सड़क पर एक पीली स्कूल बस आकर रुकी। बस का हॉर्न और बच्चों की किलकारियों ने अचानक उनका ध्यान खींचा।एक छोटा सा बच्चा, जिसका बस्ता शायद उसके वजन से भी भारी था, अपनी माँ का हाथ छुड़ाकर बस की सीढ़ियाँ चढ़ रहा था। उसकी वो बेमन से स्कूल जाने की चाल और फिर खिड़की से झांककर हाथ हिलाना—यह दृश्य देखते ही रामदीन बाबू के कदम वहीं थम गए। उनकी आँखों के सामने से वो पीली बस