समर्पण से आंगे - 4

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‎‎भाग – 4‎‎गाँव की बस सुबह-सुबह शहर पहुँची।‎‎अंकित प्लेटफॉर्म पर खड़ा था, दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।‎उसे पता था—आज सिर्फ़ माँ नहीं आ रही हैं,‎आज पूरा समाज उसके साथ आने वाला है।‎‎बस से उतरते ही माँ की नज़र सबसे पहले उसी पर पड़ी।‎वही माँ, जिनके चेहरे की झुर्रियों में उसकी पूरी परवरिश छुपी थी।‎वही आँखें, जिनमें चिंता आज डर बनकर उतर आई थी।‎‎ मां ने कहा ‎“अंकित…”‎लेकिन आवाज़ में पहले जैसा अपनापन नहीं था।‎‎“माँ,”‎अंकित ने पैर छुए।‎‎माँ ने सिर पर हाथ रखा,‎लेकिन हाथ काँप रहा था।‎‎ उन्होंने ने कहा “चल,”‎“बहुत बातें करनी हैं।”‎‎रास्ते भर कोई कुछ नहीं बोला।‎‎कमरे में पहुँचकर