भारत के एक भीड़भाड़ वाले शहर में, जहाँ सपने रोज़ जन्म लेते हैं और रोज़ ही टूट जाते हैं, वहीं से इस कहानी की शुरुआत होती है। इस शहर में रहने वाले लोग अलग-अलग ज़िंदगियाँ जी रहे थे, लेकिन एक बात सबमें समान थी—कर्ज़, मजबूरी और हार की थकान।अर्जुन वर्मा कभी एक अच्छा कबड्डी खिलाड़ी हुआ करता था। चोट लगने के बाद उसका करियर खत्म हो गया। अब वह कर्ज़ में डूबा था और साहूकार रोज़ दरवाज़े पर खड़ा मिलता।सीमा यादव एक घरेलू कामगार थी, जिसने अपने पति का इलाज कराने के लिए ज़मीन गिरवी रख दी थी।इमरान शेख बेरोज़गार