भाग -3बारिश के बाद की सुबह कुछ ज़्यादा ही खामोश थी।मंदिर के सामने वही जगह, वही फूलों की खुशबू—लेकिन आज हवा में कुछ और भी घुला हुआ था।सृष्टि जैसे ही अपनी टोकरी सजाने लगी, उसे आसपास की नज़रें महसूस होने लगीं।कुछ नज़रें जिज्ञासा से भरी थीं,कुछ तिरछी,और कुछ ऐसी—जिनमें सवाल नहीं, फ़ैसले छुपे होते हैं। लोग उसे देख कर तरह तरह की बातें करते ।“कल देखा था ना…”“छाता शेयर कर रही थी…”“विधवा होकर भी…”शब्द पूरे नहीं बोले जा रहे थे,लेकिन अर्थ साफ़ था।सृष्टि का हाथ काँप गया।उसने फूल ठीक किए, लेकिन मन बिखरता चला गया।उसी समय अंकित दूर से आता