‎समर्पण से आंगे - 2

‎‎ भाग – 2‎‎उस रात अंकित देर तक सो नहीं पाया।‎‎कमरे की बत्ती बंद थी, लेकिन दिमाग़ में सवालों की रोशनी जलती रही।‎“कल मत आना…”‎सृष्टि के ये शब्द बार-बार उसके कानों में गूंज रहे थे।‎‎वह समझ नहीं पा रहा था कि उसे क्या ज़्यादा चुभा—उसका मना करना,‎या उसके शब्दों में छुपा हुआ डर।‎‎सुबह होते ही अंकित रोज़ की तरह तैयार हुआ। माँ की तस्वीर को प्रणाम किया और दफ़्तर के लिए निकल पड़ा।‎लेकिन आज उसके कदम अपने आप मंदिर की तरफ मुड़ गए।‎‎वह दूर खड़ा रहा।‎‎सृष्टि अभी नहीं आई थी।‎‎अंकित ने राहत की साँस भी ली और हल्की सी मायूसी