1957 में ही प्रयाग में साहित्यकारों का एक सम्मेलन हुआ था। उस सम्मेलन में श्रोता के रूप में मैं उपस्थित था। वहीं मैने महादेवी वर्मा, सुमित्रानन्दन पंत, शिवदान सिंह चौहान, यशपाल आदि साहित्यकारों को देखा और सुना। हजारी प्रसाद द्विवेदी और नामवर सिंह बनारस से आए थे। प्रयाग में एक परिमल संस्था थी जिसमें धर्मवीर भारती अधिक सक्रिय थे। नामवर सिंह ने ‘नए साहित्य के मूल्यांकन की समस्याएँ’ प्रकरण पर अपना पर्चा पढ़ा जिसमें उन्होंने लघु प्रस्थिति में लघुमानव के संघर्ष को प्रयास नहीं अप्रयास कह कर उल्लेख किया था। जहाँ अंधा-युग, अंधा-कुआँ और अंधी-गली