अपूर्व ज़ोर से चीखा। उसकी चेतना जैसे दो युगों के बीच फट गई थी। अब वो सिर्फ़ अपूर्व नहीं था — वो आगाज़ बन गया था। एक साथ दो समयरेखाओं का बोझ उसके दिल पर उतर चुका था।अचानक दीवार के पीछे से आवाज़ आई — एक औरत स्वर, धीमा और थरथराता हुआ।“अगर तुम इस तक पहुँचे, तो जानो… मेरी मौत सिर्फ़ हादसा नहीं थी…”अपूर्व अपनी माँ की आवाज सुनकर सिहर गया।“मैंने तुम्हें बचाने के लिए वो सच छुपा लिया, जो आज भी हवेली की नींवों में छुपा है। फरज़ाना... सिर्फ़ रुख़साना की क़ातिल नहीं थी। मेरी मौत भी उसी की