हवेली की दीवारें कंपकपाती हुईं चुप हो चुकी थीं। अपूर्व के सामने वह दरार अब धीरे-धीरे एक दरवाजे में बदल रही थी। सामने अंधकार की एक सुरंग सी खुल गई — परंतु भय नहीं था, बल्कि कोई मधुर संगीत वहाँ से बहकर आ रहा था।“बेख़ुदी में खोया दिल…”उसने अन्वेषा की हथेली थामी, उसकी आँखें अब भी बंद थीं, मगर उसका चेहरा अब शांत था — जैसे किसी स्मृति में डूबा हो।अपूर्व ने आगे कदम बढ़ाया।अंदर अंधकार नहीं, बल्कि एक अलग ही संसार था —उन्नीस सौ चालीस का वो कमरा जीवित हो उठा था। मोमबत्तियों की मंद रौशनी, इत्र की भीनी