पहली नज़र की चुप्पी - 8

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कभी-कभी वक्त के सारे जवाब शब्दों में नहीं होते,कभी-कभी वो बस एक मुलाक़ात में छिपे होते हैं —जहाँ दो खामोशियाँ आमने-सामने आकरएक-दूसरे को पहचान लेती हैं।वो खामोशी जो कभी दूरी थी,आज शायद पुल बनने वाली थी।सर्दियों की हल्की धूप थी।आसमान साफ़ था, पर हवा में एक अजीब-सी ठंडक घुली हुई थी —ठीक वैसी ही, जैसी उन यादों में होती हैजो अचानक दिल के किसी कोने से बाहर निकल आती हैं।कॉलेज के पुराने गलियारों में आज फिर exhibition लगी थी।वही दीवारें, वही सीढ़ियाँ, वही कोने —जहाँ कभी Prakhra और Aarav की कहानी शुरू हुई थी,बिना किसी वादे के, बिना किसी नाम