एपिसोड 7: मुक्ति या मोहब्बतकमरे में अजीब-सी स्थिरता थी।न हवा चल रही थी, न मोमबत्ती काँप रही थी—जैसे वक़्त खुद साँस रोककर खड़ा हो।आरव के हाथ से शुरू हुआ काला निशान अब उसकी कलाई पार कर चुका था।उसकी धड़कनें तेज़ थीं, लेकिन आँखों में डर नहीं था।सामने—पेंटिंग।अब वह सिर्फ़ टूटी हुई नहीं थी।उसके भीतर से रोशनी झाँक रही थी—जैसे कोई दरवाज़ा आधा खुला हो।अनाया उसे देख रही थी।आज वह पहले से कहीं ज़्यादा स्पष्ट थी—लगभग इंसानी।“अगर यह दरवाज़ा पूरी तरह खुल गया,”अनाया ने काँपती आवाज़ में कहा,“तो या तो मैं आज़ाद हो जाऊँगी…या तुम पूरी तरह उस साये का