उस बाथरूम में कोई था - अध्याय 8 (फिनाले)

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रंजीत की कहानी समाप्त होते ही अलाव की धीमी चटक सबसे तेज़ आवाज़ बन गई। कोई कुछ नहीं बोला। सबके चेहरों पर वही थरथराती नारंगी रोशनी, वही सिहरन, वही बेचैनी। जंगल की ठंडी हवा अब पहले से ज़्यादा भारी लग रही थी। रंजीत धीरे-धीरे अपनी कॉफ़ी सिप कर रहा था, जैसे उसका हर घूँट पिछले किसी दर्द को पीछे छोड़ रहा हो। जुही ने आख़िर चुप्पी तोड़ी। “रंजीत… तुम हम सबको उल्लू तो नहीं बना रहे हो न? ज़ॉम्बी, सीरियसली? मुझे तो लगा ज़ॉम्बी सिर्फ़ फ़िल्मों में होते हैं।” रंजीत ने हल्की मुस्कुराहट दी। “ज़ॉम्बी तो बस एक नाम है।