उस बाथरूम में कोई था - अध्याय 7

अस्पताल से लौटकर शाम ढलने तक हम सब चुपचाप एक साथ बैठे रहे। मौसी के कमरे की डरावनी हालत, डॉक्टरों की घबराई हुई नज़रें—सब कुछ जैसे घर की हवा में चिपक गया था। पड़ोसियों ने खाना भिजवा दिया था; वही खा लिया। इतनी हिम्मत नहीं थी कि बाहर जाएँ या खुद चूल्हा जलाएँ। निशिका और बच्चे जल्दी सो गए, पर मुझे बिलकुल नींद नहीं आई। मैं पूरी रात जागा रहा—कमरे की खिड़कियाँ एक-एक बार जाँचता, बंदूक हाथ से हटाकर भी नहीं रखी, और हर हल्की आवाज़ पर चौंकता रहा। काँव-काँव करती हवा, टीन की छतों में खड़खड़ाहट, और दूर कहीं