⭐ एपिसोड 57 — "सच का चीरता तूफ़ान"कहानी — अधूरी किताब हवेली की दीवारों पर रात अब पहले से भी ज्यादा भारी हो चुकी थी। निहारिका उस कमरे के ठीक बाहर खड़ी थी जहाँ अभिराज को बंद किया गया था—उसकी साँसें तेज़ थीं, जैसे किसी अनदेखे डर ने उसे भीतर से झकड़ लिया हो।पर आज… आज वह केवल डर नहीं थी।आज उसके भीतर कोई और ही तूफ़ान जाग रहा था।अंदर से अभिराज की थपथपाहट की आवाज़ आई—“निहारिका… दरवाज़ा मत खोलना। जो भी हो… पीछे मत देखना।”पर निहारिका ने दरवाज़े पर हाथ रख दिया।“अगर मैं तुम्हें छोड़ दूँ तो मैं खुद को