यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (28)

                       : : प्रकरण - 28 ::        कुछ दिन बाद मैंने अपने हाथों की उंगलिया दिखाई थी. जो नाखुनो से पुरी भरी पड़ी थी. यह देखकर  म्युझिका चकित ऱह गई थी. उसने मुझे सवाल किया था.        " हां! " मैंने एकाक्षरी जवाब दिया.        " यह कैसे हो गया? "        उस ने मुझे सहज सवाल किया.         मैंने उसे जवाब दिया.         " यह एक चमत्कार हैं जो एक दादी मा ने किया हैं. "