हमारा जहान नहीं, पर हमारी सुबह ज़रूर —(जिया ठाकुर – आयुष ठाकुर – आर्या ठाकुर)– नई सुबह की पहली किरण पिछली रात का बोझ अभी भी घर की हवा में तैर रहा था।आयुष का गुस्से में उठकर बाहर जाना…जिया का चुपचाप रोते-रोते सो जाना…और आर्या का दोनों को देखते हुए डरी-सी आँखों से सो जाना…यह सब रात खत्म होने के बाद भी खत्म नहीं हुआ था।---सुबह 6:10 — वही कमरा, वही खामोशीजिया की आँख खुली तो बिस्तर का दूसरा हिस्सा खाली था।उसने धीरे से सांस ली—“वो अभी भी मुझसे दूर ही है…”वह उठकर किचन में चली गई।आज उसने तय किया