आशा की मौत ने पूरे शहर की हवा बदल दी थी।सुबह का सूरज भी जैसे काला दिख रहा था —और देशमुख बंगले के बाहर पुलिस की गाड़ियों की लाइटें उस अंधेरे को और बड़ा बना रही थीं।अर्जुन मेहरा गहरी सांस लेकर बंगले के बरामदे से अंदर गया।उसके चेहरे पर वही पुराना सन्नाटा था —जब दिमाग तेज़ी से चल रहा हो, लेकिन भीतर ठंड उतर चुकी हो।सावंत बोला,“सर, आशा के कमरे की तलाशी फिर से लेनी चाहिए।”अर्जुन ने सिर हिलाया,“वो कमरे में नहीं मरी है। उसका डर कमरे तक लाया गया है।”आशा का कमरा — नई तहकीकातअंदर अब भी वही हल्की